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विचार ज़िंदा है मरता नहीं, विचारों की आज़ादी पर ऐसे अंकुश?
Published: September 01, 2015 00:14 IST


इस ताबूत में जो शव रखा है, दरअसल यह उनका शव नहीं है, जिन्हें मारा गया है। उनका है जो इसे मार दिए जाने के बाद देख रहे हैं। इस शख्स ने एक अपराध किया था। पूरी ज़िंदगी विज्ञान की साधना में गुज़ार दी, कन्नड भाषा और साहित्य की यात्रा को दर्ज करते रहे, लिखते रहे, बोलते रहे और सोचते रहे। इसलिए इस शख्स को गोली मार दी गई। क्योंकि इनका बोलना कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। इनके बोलने से उस धर्म को ख़तरा बताया गया जिस धर्म के कर्मकांडों से इनका अंतिम संस्कार किया गया। इनके मार दिए जाने के बाद धर्म कितना समृद्ध हुआ ये आप पर छोड़ता हूं।

दरअसल धर्म को बचाने वाले बंदूक लेकर किसी दिन आपके ही घर आ गए तो? क्या पता आपने कुछ ऐसा बोला हो जिससे किसी देवी-देवता को अपमान हो गया हो। क्या पता आपने धर्म के नियमों का पालन न किया हो, कोई मंत्र ही न याद हो। किसी धर्म गुरु का आचरण आपको अच्छा न लग हो, इतना तो सब बोलते ही हैं, लेकिन ऐसी ही किसी बात पर कोई गोली मार दे, तब तो चुप ही रहना चाहिए।

शुक्र है बहुतों ने ऐसा नहीं सोचा और इस शख्स की अंतिम यात्रा में शामिल होने आ गए। ये कौन लोग हैं जो हर वक्त हिंसा के ख़िलाफ़ सड़कों पर आते रहे हैं। बाकी कौन लोग हैं जो ऐसी हिंसा के बाद भी घरों में रह जाते हैं। दरअसल हम सबको लगता है कि हमारी बारी नहीं आएगी, आप सोच रहे होंगे कि इतनी बातें बता रहा हूं, यही नहीं बता रहा कि ये कौन है जिसके लिए इतने लोग सड़कों पर उतरते हैं।

दरअसल ये आप भी हो सकते थे, ये आप ही हैं और अगली बार आपके बीच से ही कोई होगा। हां इस शख्स का एक नाम है और ज़रूरी नहीं है वही नाम अगली बार ही हो। ताबूत में बेज़ान पड़ा यह शख्स जब ज़िंदा था, तब कन्नड साहित्य का भारी विद्वान माना जाता था। यह शख्स जब ज़िंदा था तो प्राचीन अभिलेखों, व्याकरण, भाषा का ज्ञाता माना जाता था। जब इस लाश में ज़िंदगी धड़कती थी, तो यह शख्स एम.एम. कलबुर्गी के नाम से जाना जाता था।

77 साल की ज़िंदगी में 103 किताबें लिखने और 400 से ज़्यादा लेख लिखने वाले को मार दिया गया। इन्होंने कर्नाटक की वाचन पंरपरा का संकलन किया तो उसका अनुवाद 22 भाषाओं में किया गया। रविवार सुबह कर्नाटक के मंगलुरु में उनको घर पर कुछ लोगों ने गोली मार दी।

मंगलुरु के कल्यानगर में रहने वाले प्रोफेसर एम.एम. कलबुर्गी से पहले गुलबर्गा में लेखक पत्रकार लिंगानासत्याम्पेटे की हत्या कर उनके शव को गटर में फेंक दिया गया। हम्पी कनाडा विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे कलबुर्गी की हत्या से सब हैरान नहीं हैं। सब लाचार हैं कि ये कौन सी शक्तियां हैं जो हमेशा ताकत पा जाती हैं।

ये बुद्धिजीवी भी हुए हैं संकुचित मानसिकता के शिकार

तरह-तरह के भय पैदा कर, ऐसी शक्ति पैदा करो और बाद में ऐसी शक्ति के नाम पर दूसरों में भय पैदा करो। प्रोफेसर कलबुर्गी को किसने गोली मारी कोई नहीं जानता, लेकिन थोड़ी ही देर बाद बजरंग दल के प्रमुख ने ट्वीट कर खुशी जााहिर कर दी। बाद में डिलीट कर दिया। हम किसी की हत्या से खुश होने वाले समाज में कब बदल गए किसी को पता नहीं चला। शायद स्मार्ट फोन पर टेम्पल रन खेलते रह गए।

गनीमत है कि बीजेपी के ही नेताओं ने कहा कि हिंसा का रास्ता सही नहीं है। लिंगायत समाज के नेता येदुयरप्पा ने कहा कि कलबुर्गी लिंगायत समाज की शान थे। उनकी हत्या की निंदा करता हूं। हत्या होने पर हत्या की निंदा ठीक है। अब यह सब परिपाटी में बदलता जा रहा है। पुणे में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी जाती है। गोंविंद पंसारे की हत्या कर दी जाती है। हम चुप हो जाते हैं।

यह भी कितना दुखद है कि निंदा करने की नीयत पर सवाल किया जाए। एम.एम. कलबुर्गी मार दिए गए। सौ से अधिक किताबें लिखने वाला वाकई कोई गुनाह तो करता ही होगा, जिसे मार दिए जाने पर हमारा समाज चैनल बदल कर कोई रंगीन कहानियां देखने लगता होगा। वैसे कई लोग खुश भी थे। क्या हत्या के बाद खुशी का ट्वीट करने वाले के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगा। कोई नाम लेकर निंदा करेगा। आप देखते रहिएगा कि कौन करता है।

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। महाराष्ट्र में जब नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई तब कांग्रेस एन.सी.पी. की सरकार थी। कांग्रेस के नेताओं ने टालू बयान तो दे दिए हैं मगर सांप्रदायिकता और नैतिकता पर पहरे की राजनीति के खिलाफ सड़कों पर कोई संघर्ष नहीं है। कांग्रेस शायद नाप रही होगी कि कितना बोले तो कौन नाराज़ होगा और कितना बोले तो कौन नाराज़ नहीं होगा। कार्रवाई के नाम पर जांच का ऐलान तो दारोगा भी कर सकता है।

सांप्रदायिकता एक ज़हर है। पंद्रह अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब कहा तब तो समाज को गंभीरता से लेना चाहिए था। रविवार को कलबुर्गी की हत्या के बाद से लेकर लेकर सोमवार को दिन के ग्यारह बजे तक के उनके ट्वीट देखे। इस हत्या की निंदा की कोई ख़बर नहीं थी। ठीक बात है कि जांच होने तक कोई कैसे कह दे कि किस संगठन का हाथ है। बिल्कुल ही नहीं कहना चाहिए।

लेकिन क्या तब भी कुछ नहीं कहना चाहिए जब किसी लड़के को किसी लड़की के साथ घूमने के जुर्म में कार से उतार कर बिजली के खंभे से बांध दिया जाए। सरे बाज़ार मारा जाए। ये जो लड़का पिटा वो मज़हब से मुसलमान है, गुनाह सिर्फ इतना कि एक ही जगह काम करने वाली हिन्दू महिला के साथ जा रहा था। रास्ते में भीड़ ने कार रोकी और उतार कर मारना शुरू कर दिया।

पुलिस के आने तक इस पिटाई का वीडियो लोकल चैनल पर चलाया जा चुका था। बजरंग दल के 13 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया लेकिन क्या ऐसी घटनाओं को हम हमेशा सामान्य तरीके से ही लेते रहेंगे। क्या आप वाकई स्वीकार करने लिए तैयार हो गए हैं कि कोई आपके लिखने-बोलने से लेकर किसी के साथ घूमने तक पर नज़र रखे, तय करे।

ऐसी कई घटनाएं कर्नाटक में हो चुकी हैं। हर घटना के बाद शोक सभा होती है मगर कोई राजनीतिक सक्रियता नहीं होती। हमारे राजनेता डरने लगे हैं। डराने वालों को शह देने लगे हैं। नतीजा यह कि स्कूल कॉलेज की संस्थाएं भी डरपोक होने लगी हैं।

इतनी डरपोक कि मंगलौर में तीन साल पुरानी तस्वीर निकाल कर दो लड़कियों को शर्मसार किया जाता है। मौज-मस्ती की उनकी तस्वीर निकाल कर कॉलेज तक एबीवीपी के लोग दे आए और प्रिसिंपल से कह आए कि इससे नैतिकता का पतन हो रहा है। कॉलेज उन दो लड़कियों को निलंबित कर देता है। क्या लड़कियों ने अपने पहनने-घूमने की निगरानी का अधिकार राजनीतिक संगठनों को दे दिया है। देना चाहेंगी....

हम सब क्या होते जा रहे हैं इसका अंदाज़ा देश के सबसे शक्तिशाली नेता को तो है। उनकी इस बात को आपने भी सुनकर अनसुना किया होगा, लेकिन एक बार फिर सुनिए तो एक जवाब मिल सकता है। सोमवार को प्रधानमंत्री ने दिल्ली में गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का डिजिटल संस्कण लांच करते हुए एक बात कही है। उनका संदर्भ सरकारी कर्मचारियों का था मगर लागू हम सब पर होता है।

जीवन मशीन बन जाता है। वही सुबह जाना, शाम को लौटना वही फाइलें। ज़िंदगी के बड़े महत्वपूर्ण साल यू हीं गुज़र जाते हैं। इस पाइप लाइन में घुसे हैं तीस पैंतीस साल के बाद उधर निकलेंगे। कहीं हम सब पाइपलाइन में तो बंद नहीं हो गए हैं। कहीं ऐसा न हो जाए कि दूसरी तरफ निकलने पर हमारा कोई और इंतज़ार कर रहा हो। बंदूक लेकर। हमारे आपके लिखे-बोले का हिसाब करने के लिए। प्रधानमंत्री की बात समझ नहीं आई तो आप इसी बात को मशहूर कवि पाश की एक कविता है उसके इस अंश से भी समझ सकते हैं।

सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

आप भी थक गए होंगे कि इतनी लंबी रिपोर्ट पढ़कर। दरअसल गिरोहों को मालूम है कि आप थक जाते हैं।