This Article is From Aug 12, 2019

ऑटोमोबाइल उद्योग में मंदी की मार का असर ऑटो एंसिलरी सेक्टर पर भी

दुनिया भर में ऑटोमोबाइल उद्योग में जारी सुस्ती की मार देश के ऑटो एंसिलरी सेक्टर भी पड़ा है. उद्योग संगठन की मानें तो घरेलू और वैश्विक मंदी के साथ-साथ सरकारी नीति की अनिश्चितता और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीन की आक्रामक चाल से भारत ऑटो एंसिलरी सेक्टर प्रभावित है.

ऑटोमोबाइल उद्योग में मंदी की मार का असर ऑटो एंसिलरी सेक्टर पर भी

ऑटो सेक्टर में मंदी की मार

नई दिल्ली:

दुनिया भर में ऑटोमोबाइल उद्योग में जारी सुस्ती की मार देश के ऑटो एंसिलरी सेक्टर भी पड़ा है. उद्योग संगठन की मानें तो घरेलू और वैश्विक मंदी के साथ-साथ सरकारी नीति की अनिश्चितता और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीन की आक्रामक चाल से भारत ऑटो एंसिलरी सेक्टर प्रभावित है.  ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसीएमए) के एक शीर्ष अधिकारी ने बताया कि भारत की एंसिलरी इंडस्ट्री 57 अरब डॉलर की है जिस पर सुस्ती की जबरदस्त मार पड़ी है. उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार से भारत में कारोबार बढ़ना चाहिए लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया. एसीएमए के प्रेसिडेंट राम वेंकटरमानी ने आईएएनएस से कहा, "भारतीय ऑटो कंपोनेंट उद्योग देश में वाहन विनिर्माताओं की बिक्री, रिप्लेसमेंट और निर्यात की तिपाई पर निर्भर है. सभी सेगमेंट पर दबाव देखा जा रहा है." उन्होंने कहा, "घरेलू ओईएम (ओरिजनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चर्स) मार्केट और सभी वाहन विनिर्माता भारी दबाव में है. पिछले 10-12 महीनों से उनकी बिक्री घटती जा रही है."

उन्होंने बताया कि बाजार के बाद रिप्लेसमेंट बाजार भी वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद सुस्ती के दौर से गुजर रहा है. उन्होंने कहा, "लोग जरूरत के हिसाब से खरीदारी कर रहे हैं और कोई अतिरिक्त मदों में खर्च नहीं करना चाहते हैं." निर्यात की बात करें तो ऑटो कंपोनेंट विनिर्माता दबाव में हैं क्योंकि उनके विदेशी ग्रामक भी बिक्री घटने के कारण बुरे दौर से गुजर रहे हैं.  उनसे जब पूछा गया कि क्या उद्योग को अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार का फायदा नहीं मिल पाया क्योंकि भारत मुख्य रूप से यूरोप और अमेरिका को निर्यात करता है. इस पर उन्होंने कहा, "अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार का भारतीय कंपनियों को फायदा मिला होगा. हालांकि अमेरिका से मांग में वृद्धि हुई है लेकिन चीन आक्रामक नीति अपना रहा है और वह दूसरे देशों में स्थित अपने संयंत्रों से अमेरिका को सप्लाई कर रहा है। यूरोप में भी चीनी कंपनियां आक्रामक नीति अपना रही है."

पिछले वित्तवर्ष में भारतीय ऑटो कंपनेंट उद्योग ने 14.5 फीसदी की विकास दर दर्ज करते हुए 3,95,902 करोड़ रुपये का कारोबार किया. पिछले साल निर्यात 17.1 फीसदी बढ़कर 1,,06,048 करोड़ रुपये हो गया.  एसीएमए के अनुसार, वर्ष 2018-19 में यूरोप के निर्यात का योगदान 33 फीसदी रहा जिसके बाद 29 फीसदी निर्यात उत्तरी अमेरिका और एशियाई बाजार का योगदान 26 फीसदी रहाट.  वेंकटरमानी के अनुसार, इस बार ऑटोमोटिव उद्योग का संकट अभूतपूर्व है और वाहन विनिर्माताओं ने उत्पादन मं 15-20 फीसदी की कटौती की है. 



(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)